राजस्थान की चित्रकला
राजस्थानी चित्रकला भारतीय चित्रकला की एक समृद्ध परंपरा है, जिसे "राजपूत चित्रकला" भी कहा जाता है। विभिन्न रियासतों के राजाश्रय में अलग-अलग शैलियां (कलमें) विकसित हुईं। इनमें भक्ति, श्रृंगार, प्रकृति, शिकार और दरबारी जीवन का सुंदर चित्रण मिलता है।
📑 विषय सूची 12 टॉपिक
परिचय एवं वर्गीकरण
- राजस्थानी चित्रकला का वैज्ञानिक विभाजन आनंद कुमार स्वामी ने 1916 में अपनी पुस्तक "राजपूत पेंटिंग्स" में किया; इसलिए इसे "राजपूत शैली" भी कहते हैं।
- राजस्थानी चित्रकला की प्रारंभिक व सबसे प्राचीन उपलब्ध कृति — "श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि" (1260 ई.), जो मेवाड़ के आहड़ में तेजसिंह के समय चित्रित हुई।
- भौगोलिक आधार पर चित्रकला को चार स्कूलों में बांटा जाता है:
मेवाड़ स्कूल
उदयपुर (मेवाड़) शैली
राजस्थानी चित्रकला की जनक शैली
- महाराणा जगतसिंह प्रथम (1628-52) के समय मेवाड़ चित्रकला का स्वर्णकाल था; उन्होंने राजमहल में चित्रकारों का कारखाना "चितेरों की ओवरी" (तस्वीरां रो कारखानो) स्थापित किया।
- साहिबदीन ने रामायण, भागवत पुराण व रागमाला के चित्र बनाए।
- विषय — कृष्ण लीला, रामायण, महाभारत, गीत गोविंद, रसिकप्रिया, नायिका भेद, दरबार व शिकार।
⚔️ चावंड शैली
महाराणा प्रताप के समय चावंड राजधानी बनी और यह शैली विकसित हुई। महाराणा अमरसिंह प्रथम के समय 1605 ई. में चित्रकार निसारदीन ने "रागमाला" चित्रित की।
🐄 नाथद्वारा शैली
श्रीनाथजी (वल्लभ संप्रदाय) से संबंधित; मेवाड़ व ब्रज शैली का मिश्रण। कपड़े पर श्रीनाथजी के पीछे लगने वाले चित्र "पिछवाई" प्रसिद्ध। गाय, केले के वृक्ष, हरा-पीला रंग।
🏰 देवगढ़ शैली
देवगढ़ (राजसमंद) ठिकाने में विकसित; मेवाड़, मारवाड़ व ढूंढाड़ शैलियों का समन्वय। श्रीधर अंधारे ने इसे प्रकाश में लाया। चित्रकार — चोखा, बैजनाथ, कंवला।
मारवाड़ स्कूल
किशनगढ़ शैली
बणी-ठणी · भारत की मोनालिसा
- सावंतसिंह (कवि नाम नागरीदास) की प्रेमिका व गायिका बणी-ठणी का चित्र निहालचंद ने बनाया।
- एरिक डिकिन्सन ने बणी-ठणी को "भारत की मोनालिसा" कहा। इस पर 5 मई 1973 को भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया।
- किशनगढ़ शैली को प्रकाश में लाने का श्रेय एरिक डिकिन्सन व डॉ. फैयाज अली को है।
- लंबी गर्दन, नुकीली नासिका, पतले होंठ और खंजन नेत्र — इस शैली में नारी सौंदर्य की विशेष पहचान।
🐎 जोधपुर शैली
स्वर्णकाल — महाराजा मानसिंह। रंग — पीला; वृक्ष — आम; नेत्र — बादाम जैसे; पशु — घोड़ा, ऊंट। मानसिंह के समय नाथ संप्रदाय के चित्र बने। ढोला-मारू, मूमल-महेन्द्र जैसी प्रेमकथाएं प्रिय विषय।
🐫 बीकानेर शैली
स्वर्णकाल — महाराजा अनूपसिंह। मुगल प्रभाव सर्वाधिक; चित्रकार "उस्ता" कहलाते थे (अली रज़ा, रुकनुद्दीन)। चित्रकार चित्र पर अपना नाम व तिथि लिखते थे। ऊंट की खाल पर स्वर्ण चित्रण "उस्ता कला" — हिसामुद्दीन उस्ता (पद्मश्री)।
🏜️ जैसलमेर शैली
मुगल प्रभाव से मुक्त स्थानीय शैली; मूमल इस शैली का प्रसिद्ध चित्र। राजाश्रय — महारावल हरराज, अखैसिंह।
🪟 नागौर शैली
पारदर्शी वेशभूषा का अंकन; बुझे हुए (हल्के) रंगों का प्रयोग। नागौर दुर्ग के भित्ति चित्र प्रसिद्ध।
ढूंढाड़ स्कूल
👑 जयपुर शैली
स्वर्णकाल — सवाई प्रतापसिंह। चित्रकारों का विभाग "सूरतखाना" कहलाता था। रंग — हरा; वृक्ष — पीपल, वट; आदमकद व्यक्ति चित्र (पोर्ट्रेट) और भित्ति चित्र (आलागीला/आराइश) प्रसिद्ध। चित्रकार — साहिबराम, लालचंद।
🐘 अलवर शैली
स्वर्णकाल — महाराजा विनयसिंह; जयपुर व मुगल शैली का समन्वय। वेश्याओं के चित्र, योगासन के चित्र, हाथी दांत पर चित्रकारी (मूलचंद) प्रसिद्ध। चित्रकार — बलदेव, सालिगराम, नानकराम, डालचंद।
🏰 आमेर शैली
ढूंढाड़ की प्राचीनतम शैली; मानसिंह प्रथम के समय विकसित। आमेर महल व मौजमाबाद (जयपुर) के भित्ति चित्र प्रमुख उदाहरण।
🎯 उणियारा शैली
टोंक जिले के उणियारा ठिकाने में; जयपुर व बूंदी शैली का मिश्रण। चित्रकार — धीमा, मीरबक्श, काशी।
🖼️ शेखावाटी शैली
हवेलियों के भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध; लोक जीवन व अंग्रेज़ी प्रभाव (रेल, मोटर, साहब) के चित्र। "ओपन एयर आर्ट गैलरी"।
हाड़ौती स्कूल
🦚 बूंदी शैली
स्वर्णकाल — राव उम्मेदसिंह, जिन्होंने "चित्रशाला" बनवाई (भित्ति चित्रों का खज़ाना)। रंग — हरा; वृक्ष — खजूर; पशु-पक्षी — मोर, हिरण, शेर। प्रकृति, वर्षा ऋतु व पशु-पक्षियों का सर्वाधिक चित्रण।
🐅 कोटा शैली
स्वर्णकाल — महाराव उम्मेदसिंह। शिकार के दृश्यों के लिए प्रसिद्ध — रानियों को भी शिकार करते दिखाया गया। वृक्ष — खजूर। चित्रकार — डालू (1768 की रागमाला), लच्छीराम।
🏞️ झालावाड़ शैली
झालावाड़ के राजमहलों के भित्ति चित्र; श्रीनाथजी व कृष्ण लीला के चित्र।
शैलियों की तुलना
| शैली | स्वर्णकाल (शासक) | प्रमुख रंग | वृक्ष | विशेष पहचान |
|---|---|---|---|---|
| मेवाड़ | जगतसिंह प्रथम | पीला, लाल | कदंब | मीन नेत्र, हाथी |
| जोधपुर | मानसिंह | पीला | आम | बादाम नेत्र, घोड़ा |
| बीकानेर | अनूपसिंह | पीला | — | उस्ता चित्रकार, मुगल प्रभाव |
| किशनगढ़ | सावंतसिंह | सफेद, गुलाबी | केला | बणी-ठणी, खंजन नेत्र |
| जयपुर | सवाई प्रतापसिंह | हरा | पीपल, वट | आदमकद चित्र, सूरतखाना |
| अलवर | विनयसिंह | — | — | वेश्या चित्र, हाथी दांत |
| बूंदी | उम्मेदसिंह | हरा | खजूर | चित्रशाला, मोर |
| कोटा | उम्मेदसिंह | — | खजूर | शिकार दृश्य |
| नाथद्वारा | — | हरा, पीला | केला | पिछवाई, गाय |
लोक चित्रकला
📜 फड़
रेज़ी (खादी) कपड़े पर लोक देवताओं के जीवन का चित्रण; शाहपुरा (भीलवाड़ा) का जोशी परिवार प्रसिद्ध। श्रीलाल जोशी (पद्मश्री)। पाबूजी की फड़ सबसे लोकप्रिय, देवनारायण की सबसे लंबी।
🪟 कावड़
लकड़ी का मंदिरनुमा चल देवघर, जिसके कई कपाट खुलते जाते हैं और कथावाचक (कावड़िया भाट) कथा सुनाता है। बस्सी (चित्तौड़गढ़) के खैरादी परिवार बनाते हैं।
🖼️ पिछवाई
नाथद्वारा में श्रीनाथजी की प्रतिमा के पीछे लगाए जाने वाले कपड़े पर बने बड़े चित्र; कृष्ण लीला के दृश्य।
🔶 मांडणा
त्योहारों व मांगलिक अवसरों पर घर के आंगन व दीवारों पर खड़िया व गेरू से बनाई जाने वाली ज्यामितीय आकृतियां — "शुभ-अशुभ की प्रतीक"।
🍂 सांझी
श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) में कुंवारी कन्याएं दीवार पर गोबर से सांझी बनाती हैं। नाथद्वारा का "केले के पत्तों की सांझी" प्रसिद्ध; उदयपुर में "सांझी का मंदिर" (मछंदरनाथ)।
🧱 पाने
कागज़ पर बने देवी-देवताओं के चित्र, जिन्हें त्योहारों पर पूजा जाता है; श्रीनाथजी का पाना सबसे कलात्मक।
🎨 थापा / गोदना
गोदना — शरीर पर स्थायी चित्र (टैटू), जनजातियों में लोकप्रिय। मेहंदी को राजस्थान में सुहाग का प्रतीक माना जाता है; सोजत (पाली) की मेहंदी प्रसिद्ध।
आधुनिक चित्रकार
| चित्रकार | प्रसिद्धि |
|---|---|
| रामगोपाल विजयवर्गीय | सवाई माधोपुर; एकल चित्र प्रदर्शनी करने वाले राजस्थान के प्रथम चित्रकार; पद्मश्री |
| भूरसिंह शेखावत | बीकानेर; स्वतंत्रता सेनानियों व ग्रामीण जीवन के चित्र |
| परमानंद चोयल | कोटा; "भैंसों के चितेरे" |
| देवकीनंदन शर्मा | अलवर; "मास्टर ऑफ नेचर एंड लिविंग ऑब्जेक्ट्स" |
| कृपालसिंह शेखावत | सीकर; ब्लू पॉटरी के पुनरुद्धारक; पद्मश्री |
| गोवर्धनलाल जोशी (बाबा) | कांकरोली; भीलों के चितेरे |
| ज्योति स्वरूप | जोधपुर; "इनर जंगल" चित्र श्रृंखला |
| सौभाग्यमल गहलोत | जयपुर; "नीड़ का चितेरा" |
⚠️ परीक्षा में भ्रम वाले तथ्य: (1) राजस्थानी चित्रकला की चार प्रमुख शैलियां (स्कूल) — मेवाड़, मारवाड़, हाड़ौती, ढूंढाड़। (2) बणी-ठणी — किशनगढ़ शैली, चित्रकार निहालचंद; “भारत की मोनालिसा” — एरिक डिकिन्सन ने कहा। (3) सबसे प्राचीन शैली — मेवाड़; प्रथम चित्रित ग्रंथ — श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (1260)।
वन-लाइनर तथ्य (Quick Revision)
- राजस्थानी चित्रकला का वैज्ञानिक वर्गीकरण — आनंद कुमार स्वामी (1916)।
- सबसे प्राचीन चित्रित ग्रंथ — श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (1260, आहड़)।
- राजस्थानी चित्रकला की जनक शैली — मेवाड़ शैली।
- चावंड की रागमाला (1605) — निसारदीन।
- "भारत की मोनालिसा" — बणी-ठणी (निहालचंद, किशनगढ़); डाक टिकट 5 मई 1973।
- बीकानेर के चित्रकार कहलाते थे — उस्ता।
- जयपुर के चित्रकारों का विभाग — सूरतखाना; मेवाड़ का — चितेरों की ओवरी।
- बूंदी की चित्रशाला — राव उम्मेदसिंह।
- शिकार दृश्यों के लिए प्रसिद्ध — कोटा शैली।
- कावड़ बनाने का केंद्र — बस्सी (चित्तौड़गढ़)।
- "भैंसों के चितेरे" — परमानंद चोयल।
- पिछवाई — नाथद्वारा।
- पिछवाई चित्रकला — नाथद्वारा।
- फड़ चित्रकला — शाहपुरा (भीलवाड़ा), जोशी परिवार।
- शिकार दृश्यों के लिए प्रसिद्ध — कोटा शैली।
- बूंदी की चित्रशाला — राव उम्मेदसिंह।
अभ्यास प्रश्न (MCQ)
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1 "बणी-ठणी" चित्र किस शैली से संबंधित है?
2 बणी-ठणी का चित्रकार कौन था?
3 चावंड शैली में रागमाला (1605) किसने चित्रित की?
4 बीकानेर शैली के चित्रकार किस नाम से जाने जाते थे?
5 किस शैली में शिकार के दृश्यों की प्रधानता है?
6 मेवाड़ शैली का प्रमुख वृक्ष कौनसा है?
7 "सूरतखाना" किस रियासत से संबंधित है?
8 कावड़ कला का प्रमुख केंद्र कौनसा है?
9 बूंदी की चित्रशाला का निर्माण किसने करवाया?
10 "भैंसों के चितेरे" किस चित्रकार को कहा जाता है?