मेवाड़ का गुहिल-सिसोदिया वंश
मेवाड़ का गुहिल वंश विश्व के सबसे लंबे समय तक एक ही क्षेत्र पर शासन करने वाले राजवंशों में गिना जाता है — 566 ई. से 1949 तक लगभग 1400 वर्ष। इस वंश ने कभी मुगलों के सामने पूर्ण समर्पण नहीं किया और बप्पा रावल, कुंभा, सांगा, प्रताप जैसे महान शासक दिए। मेवाड़ के शासक स्वयं को एकलिंगजी का दीवान मानते थे।
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उत्पत्ति एवं शाखाएं
- वंश के संस्थापक गुहादित्य (गुहिल) — 566 ई.; उनके नाम पर वंश "गुहिल" कहलाया।
- उत्पत्ति के मत: गौरीशंकर हीराचंद ओझा — सूर्यवंशी (राम के पुत्र लव के वंशज); डी.आर. भंडारकर — ब्राह्मण (नागर ब्राह्मण) मूल; कुंभलगढ़ प्रशस्ति में बप्पा को "विप्रवंशीय" कहा गया।
- वंश की दो शाखाएं — रावल शाखा (बप्पा से रतनसिंह तक, 1303 में समाप्त) और राणा शाखा (सिसोदा गांव के हम्मीर से आरंभ, इसलिए "सिसोदिया")।
- राजधानियां — नागदा → चित्तौड़ → उदयपुर (1559) → चावंड (प्रताप) → उदयपुर।
- राजचिह्न में एक ओर राजपूत व दूसरी ओर भील योद्धा; ध्येय वाक्य — "जो दृढ़ राखे धर्म को, तिहि राखे करतार"।
रावल शाखा
बप्पा रावल (कालभोज)
मेवाड़ राज्य का वास्तविक संस्थापक · 734-753 ई.
- मूल नाम कालभोज; हारीत ऋषि के शिष्य, जिनके आशीर्वाद से राज्य मिला।
- 734 ई. में मौर्य शासक मान मोरी से चित्तौड़ जीता।
- अरब आक्रमणों को रोकने में योगदान; कैलाशपुरी में एकलिंगजी मंदिर बनवाया।
- बप्पा रावल के सोने के सिक्के (115 ग्रेन) अजमेर से मिले।
- रणकपुर प्रशस्ति (1439) में बप्पा और कालभोज को अलग-अलग व्यक्ति बताया गया है।
🐗 अल्लट (आलू रावल)
10वीं सदी; आहड़ को दूसरी राजधानी बनाया; आहड़ में वराह मंदिर; मेवाड़ में नौकरशाही (अधिकारी तंत्र) की शुरुआत; हूण राजकुमारी हरियादेवी से विवाह।
⚔️ जैत्रसिंह (1213-1250)
भूताला के युद्ध (1227) में दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश को हराया। इल्तुतमिश द्वारा नागदा नष्ट किए जाने के बाद चित्तौड़ को राजधानी बनाया। इनके काल को मेवाड़ का स्वर्णकाल माना जाता है।
🪷 रावल रतनसिंह (1302-03)
1303 में अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण; रानी पद्मिनी का जौहर; गोरा-बादल की वीरता; चित्तौड़ का नाम "खिज्राबाद"। मलिक मुहम्मद जायसी ने 1540 में "पद्मावत" लिखा। रतनसिंह के साथ रावल शाखा समाप्त।
राणा (सिसोदिया) शाखा
| शासक | काल | प्रमुख घटनाएं / उपलब्धियां |
|---|---|---|
| हम्मीर | 1326-64 | सिसोदा गांव के; खिलजी के सामंत मालदेव सोनगरा से चित्तौड़ पुनः जीता; सिंगोली युद्ध में मुहम्मद बिन तुगलक को हराया; "मेवाड़ का उद्धारक", "विषम घाटी पंचानन"; बरवड़ी (अन्नपूर्णा) माता का मंदिर |
| क्षेत्रसिंह (खेता) | 1364-82 | मालवा के अमीशाह को हराया |
| लाखा | 1382-1421 | जावर में चांदी की खान; छीतू बंजारे द्वारा पिछोला झील; मारवाड़ की हंसाबाई से विवाह — शर्त कि उसका पुत्र राजा बनेगा; बड़े पुत्र चूंडा ने राज्याधिकार त्यागा — "मेवाड़ का भीष्म" |
| मोकल | 1421-33 | समिद्धेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार; श्रृंगी ऋषि शिलालेख; चाचा व मेरा ने हत्या की |
महाराणा कुंभा (1433-1468)
स्थापत्य कला का जनक · हिंदू सुरताण · अभिनव भरताचार्य
- आरंभ में मारवाड़ के रणमल का प्रभाव रहा; 1438 में रणमल की हत्या हुई। बाद में कुंभा और राव जोधा के बीच "आवल-बावल की संधि" से मेवाड़-मारवाड़ की सीमा तय हुई।
- सारंगपुर युद्ध (1437) में मालवा के महमूद खिलजी को हराया; इसकी याद में विजय स्तंभ (1440-48)।
- 1456 में मालवा व गुजरात ने कुंभा के विरुद्ध चंपानेर की संधि की, पर कुंभा ने दोनों को परास्त किया।
- दुर्ग — कुंभलगढ़ (शिल्पी मंडन), अचलगढ़ (पुनर्निर्माण), बसंतगढ़, मचान दुर्ग आदि।
- ग्रंथ — संगीतराज, संगीत मीमांसा, सूड़ प्रबंध; गीत गोविंद पर "रसिकप्रिया" टीका। दरबार में मंडन, कान्ह व्यास, अत्रि-महेश भट्ट।
- उपाधियां — महाराजाधिराज, हिंदू सुरताण, अभिनव भरताचार्य, हाल गुरु, छाप गुरु, राणो रासो।
- कुंभलगढ़ में मामादेव कुंड पर पुत्र ऊदा ने हत्या की।
🗡️ ऊदा (उदयकरण)
पितृहंता होने के कारण मेवाड़ के सामंतों ने इसे स्वीकार नहीं किया; "हत्यारा" कहलाया।
🏹 रायमल (1473-1509)
पुत्र — पृथ्वीराज ("उड़णा राजकुमार"), जयमल, संग्रामसिंह (सांगा)। उत्तराधिकार संघर्ष में सांगा की एक आंख चली गई।
राणा सांगा (संग्रामसिंह, 1509-1528)
हिंदूपत · अंतिम हिंदू शासक जिसने संगठित राजपूत शक्ति का नेतृत्व किया
- युद्धों में एक आंख, एक हाथ खोया, एक पैर से लंगड़े हुए और शरीर पर 80 घाव थे — "सैनिकों का भग्नावशेष"।
- विजय — खातोली (1517) व बाड़ी (1518) में इब्राहिम लोदी; गागरोन (1519) में महमूद खिलजी द्वितीय (उसे बंदी बनाकर बाद में मुक्त किया); बयाना (16 फरवरी 1527) में बाबर की सेना।
- खानवा (17 मार्च 1527) में बाबर से पराजय; युद्ध से पहले "पाती परवन" परंपरा से राजपूत राजाओं को आमंत्रित किया।
- बाबर ने अपनी आत्मकथा में सांगा को भारत के सबसे शक्तिशाली शासकों में गिना।
- 30 जनवरी 1528 को कालपी में अपने ही सामंतों द्वारा विष दिए जाने से मृत्यु; छतरी मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) में।
| शासक | काल | प्रमुख घटनाएं |
|---|---|---|
| रतनसिंह द्वितीय | 1528-31 | बूंदी के सूरजमल हाड़ा से संघर्ष में दोनों की मृत्यु |
| विक्रमादित्य | 1531-36 | गुजरात के बहादुर शाह का आक्रमण — चित्तौड़ का दूसरा साका (1534-35); रानी कर्णावती का जौहर; बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या की |
| बनवीर | 1536-40 | दासी पुत्र; उदयसिंह को मारने का प्रयास — पन्नाधाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान दिया |
| उदयसिंह | 1540-72 | कुंभलगढ़ में राज्याभिषेक; 1559 में उदयपुर बसाया, उदयसागर झील; अकबर का चित्तौड़ आक्रमण — तीसरा साका (1567-68), जयमल-पत्ता; गोगुंदा में मृत्यु |
महाराणा प्रताप (1572-1597)
स्वतंत्रता के अमर प्रतीक · बचपन का नाम "कीका"
- उदयसिंह ने छोटे पुत्र जगमाल को उत्तराधिकारी बनाया था, पर सामंतों ने प्रताप को राणा बनाया।
- अकबर ने अधीनता के लिए चार दूत भेजे — जलाल खां कोरची (1572), मानसिंह (1573), भगवंतदास (1573), टोडरमल (1573)।
- हल्दीघाटी (18 जून 1576) — मुगल सेनापति मानसिंह; झाला मान का बलिदान; चेतक ने प्राण दिए।
- 1578 में मुगल सेनापति शाहबाज़ खां ने कुंभलगढ़ जीता; भामाशाह ने आर्थिक सहायता दी।
- दिवेर (1582) — "मेवाड़ का मैराथन"; इसके बाद चित्तौड़ व मांडलगढ़ को छोड़कर अधिकांश मेवाड़ वापस जीत लिया।
- छतरी — बांडोली (सलूंबर), 8 खंभों वाली।
उत्तरकालीन शासक
| शासक | काल | प्रमुख घटनाएं / उपलब्धियां |
|---|---|---|
| अमरसिंह प्रथम | 1597-1620 | 1615 में मुगल-मेवाड़ संधि (जहांगीर, शाहज़ादा खुर्रम) — शर्तें: राणा स्वयं मुगल दरबार में नहीं जाएगा; युवराज कर्णसिंह दरबार में रहेगा; चित्तौड़ की मरम्मत नहीं होगी। चावंड में रागमाला (निसारदीन, 1605) |
| कर्णसिंह | 1620-28 | जग मंदिर का निर्माण आरंभ; विद्रोही शाहज़ादा खुर्रम को शरण |
| जगतसिंह प्रथम | 1628-52 | जगदीश (जगन्नाथराय) मंदिर (1652); चित्रकला का स्वर्णकाल — "चितेरों की ओवरी" |
| राजसिंह | 1652-80 | अकाल राहत हेतु राजसमंद झील व राजप्रशस्ति; किशनगढ़ की चारुमती से विवाह (औरंगजेब से टकराव); जज़िया का विरोध; श्रीनाथजी (सिहाड़) व द्वारकाधीश (कांकरोली) की प्रतिमाएं स्थापित; दुर्गादास राठौड़ की सहायता |
| जयसिंह | 1680-98 | जयसमंद (ढेबर) झील का निर्माण |
| संग्रामसिंह द्वितीय | 1710-34 | सहेलियों की बाड़ी; वैद्यनाथ मंदिर |
| जगतसिंह द्वितीय | 1734-51 | हुरड़ा सम्मेलन (17 जुलाई 1734) की अध्यक्षता — मराठों के विरुद्ध राजपूत एकता का प्रयास; जग निवास (लेक पैलेस) |
| भीमसिंह | 1778-1828 | पुत्री कृष्णा कुमारी को लेकर जयपुर-जोधपुर विवाद; 1810 में कृष्णा कुमारी को विष दिया गया; 1818 में अंग्रेज़ों से संधि |
| स्वरूपसिंह | 1842-61 | डाकन प्रथा पर रोक (1853); 1857 में अंग्रेज़ों का साथ; स्वरूपशाही सिक्के |
| सज्जनसिंह | 1874-84 | सज्जनगढ़ (मानसून पैलेस); श्यामलदास का "वीर विनोद"; देश हितैषिणी सभा (1877) |
| फतहसिंह | 1884-1930 | 1903 के दिल्ली दरबार में भाग नहीं लिया (केसरीसिंह बारहठ के "चेतावणी रा चूंगट्या"); बिजौलिया आंदोलन का काल |
| भूपालसिंह | 1930-55 | संयुक्त राजस्थान के राजप्रमुख; वृहत् राजस्थान के महाराजप्रमुख (1949) |
मेवाड़ के साके
| साका | वर्ष | आक्रमणकारी | केसरिया / जौहर |
|---|---|---|---|
| चित्तौड़ का प्रथम | 1303 | अलाउद्दीन खिलजी | रावल रतनसिंह / रानी पद्मिनी |
| चित्तौड़ का द्वितीय | 1534-35 | बहादुर शाह (गुजरात) | बाघसिंह / रानी कर्णावती |
| चित्तौड़ का तृतीय | 1567-68 | अकबर | जयमल-पत्ता / फूलकंवर |
⚠️ परीक्षा में भ्रम वाले तथ्य: (1) गुहिल वंश के संस्थापक — गुहादित्य (566 ई.); बप्पा रावल का मूल नाम — कालभोज। (2) खानवा (17 मार्च 1527) में सांगा बाबर से हारे, पर उससे पहले बयाना में जीते थे। (3) हल्दीघाटी — 18 जून 1576; मुगल सेनापति — मानसिंह; दिवेर (1582) — “मेवाड़ का मैराथन”।
वन-लाइनर तथ्य (Quick Revision)
- गुहिल वंश के संस्थापक — गुहादित्य (566 ई.); वास्तविक संस्थापक — बप्पा रावल।
- बप्पा रावल के गुरु — हारीत ऋषि; चित्तौड़ विजय — 734 ई.।
- भूताला युद्ध (1227) — जैत्रसिंह vs इल्तुतमिश।
- "पद्मावत" (1540) — मलिक मुहम्मद जायसी।
- "मेवाड़ का उद्धारक" — हम्मीर; "मेवाड़ का भीष्म" — चूंडा।
- चंपानेर की संधि (1456) — मालवा + गुजरात, कुंभा के विरुद्ध।
- "उड़णा राजकुमार" — पृथ्वीराज (रायमल का पुत्र)।
- सांगा की मृत्यु — 30 जनवरी 1528, कालपी; छतरी — मांडलगढ़।
- अकबर के चार दूत — जलाल खां, मानसिंह, भगवंतदास, टोडरमल।
- मुगल-मेवाड़ संधि — 1615, अमरसिंह प्रथम।
- हुरड़ा सम्मेलन (1734) की अध्यक्षता — जगतसिंह द्वितीय।
- कृष्णा कुमारी विवाद — भीमसिंह के समय; अंग्रेज़ों से संधि — 1818।
- विजय स्तंभ — कुंभा (सारंगपुर में मालवा पर विजय, 1437)।
- कुंभलगढ़ दुर्ग के वास्तुकार — मंडन।
- मेवाड़-मुगल संधि — 1615, अमरसिंह व जहांगीर।
- उदयपुर की स्थापना — उदयसिंह (1559)।
अभ्यास प्रश्न (MCQ)
विकल्प चुनें — सही उत्तर तुरंत दिखेगा।
1 बप्पा रावल का मूल नाम क्या था?
2 भूताला युद्ध में किस मेवाड़ शासक ने इल्तुतमिश को हराया?
3 "मेवाड़ का भीष्म" किसे कहा जाता है?
4 चंपानेर की संधि किसके विरुद्ध हुई?
5 "उड़णा राजकुमार" किसे कहा गया?
6 राणा सांगा की मृत्यु कहां हुई?
7 उदयपुर नगर की स्थापना कब हुई?
8 महाराणा प्रताप के पास अकबर का पहला दूत कौन था?
9 मुगल-मेवाड़ संधि (1615) किस महाराणा ने की?
10 हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता किसने की?