राजस्थान के लोक देवता

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राजस्थान की लोक संस्कृति में लोक देवता वे महापुरुष हैं जिन्होंने अपने वीरतापूर्ण कार्यों, गौ-रक्षा, शरणागत की रक्षा, समाज सुधार और जन-कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उनके इन्हीं असाधारण कार्यों के कारण जनमानस ने उन्हें देवता के रूप में पूजना शुरू कर दिया। आज भी गांव-गांव में इनके थान, देवरे और चबूतरे बने हुए हैं, जहां जात्री मनौतियां मांगते हैं।

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पंच पीर
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गोगाजी
सर्पों के देवता
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पाबूजी
ऊंटों के देवता
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देवनारायण
सबसे लंबी फड़
📑 विषय सूची 14 टॉपिक

लोक देवता: परिचय एवं विशेषताएं

राजस्थान के अधिकांश लोक देवता मध्यकाल के वीर योद्धा या संत थे। इनमें से कई ने गायों की रक्षा करते हुए प्राण त्यागे, इसलिए इन्हें "झुंझार" भी कहा जाता है। ये देवता किसी एक जाति या धर्म तक सीमित नहीं हैं — रामदेवजी और गोगाजी को हिंदू और मुसलमान दोनों समान श्रद्धा से पूजते हैं।

पंच पीर

मारवाड़ क्षेत्र में पांच लोक देवताओं को "पंच पीर" कहा जाता है। ये हैं — पाबूजी, हड़बूजी, रामदेवजी, गोगाजी और मेहाजी मांगलिया।

पाबू, हड़बू, रामदे, मांगलिया मेहा।
पांचू पीर पधारजो, गोगाजी जेहा॥

लोक दोहा
💡 याद रखने की ट्रिक: "पा-ह-रा-गो-मे" — पाबूजी, हड़बूजी, रामदेवजी, गोगाजी, मेहाजी।
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गोगाजी

सर्पों के देवता · जाहर पीर · गोगा बप्पा

पंच पीर
जन्म स्थानददरेवा (चूरू)
वंशचौहान
पिताजेवरसिंह
माताबाछल दे
पत्नीकेलमदे
गुरुगोरखनाथ
सवारीनीली घोड़ी
मेलाभाद्रपद कृष्ण नवमी
  • गोगाजी ने गायों की रक्षा हेतु महमूद गजनवी से युद्ध किया। उनकी वीरता देखकर गजनवी ने उन्हें "जाहर पीर" (साक्षात देवता) कहा।
  • जमीन के विवाद को लेकर अपने मौसेरे भाइयों अर्जन-सर्जन से भी इनका युद्ध हुआ।
  • शीर्षमेड़ी (शीश मेड़ी): ददरेवा (चूरू) — यहां युद्ध में इनका शीश गिरा।
  • धुरमेड़ी: गोगामेड़ी, नोहर (हनुमानगढ़) — यहां धड़ गिरा। मुख्य मंदिर मकबरा शैली में है जिस पर "बिस्मिल्लाह" लिखा है। इसका निर्माण फिरोजशाह तुगलक ने तथा जीर्णोद्धार बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने करवाया।
  • इनका थान प्रायः खेजड़ी वृक्ष के नीचे होता है, जहां पत्थर पर सर्प की आकृति अंकित रहती है। कहावत है — "गांव-गांव खेजड़ी, गांव-गांव गोगो"।
  • गोगाजी की ओल्डी: किलोरियों की ढाणी, सांचौर (जालोर)।
  • किसान वर्षा के बाद हल जोतने से पहले गोगाजी के नाम की "गोगा राखड़ी" (9 गांठों वाली) हल और हाली को बांधते हैं।
  • गोगाजी के गीतों के साथ डेरू वाद्य बजाया जाता है।
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पाबूजी राठौड़

ऊंटों के देवता · प्लेग रक्षक · लक्ष्मण के अवतार

पंच पीर
जन्म स्थानकोलू (फलोदी)
वंशराठौड़
पिताधांधल जी
माताकमलादे
पत्नीफूलमदे (सुप्यारदे) सोढी
घोड़ीकेसर कालमी
प्रतीकभाला लिए अश्वारोही
मेलाचैत्र अमावस्या, कोलू
  • मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊंट (सांडे) लाने का श्रेय पाबूजी को है, इसलिए इन्हें ऊंटों का देवता कहा जाता है। ऊंट बीमार होने पर रेबारी (राइका) जाति के लोग इनकी पूजा करते हैं।
  • अमरकोट के सूरजमल सोढा की पुत्री से विवाह के समय फेरों के बीच ही उठकर, देवल चारणी की गायों को जींदराव खींची से छुड़ाने चले गए और देचू गांव में वीरगति पाई।
  • केसर कालमी घोड़ी इन्हें देवल चारणी ने दी थी।
  • पाबूजी की फड़: राजस्थान की सबसे लोकप्रिय फड़। इसे नायक/आयड़ी जाति के भोपे रावणहत्था वाद्य के साथ बांचते हैं।
  • पाबूजी के पवाड़े माठ वाद्य के साथ गाए जाते हैं।
  • थोरी जाति के लोग सारंगी पर इनका यश गाते हैं, जिसे "पाबूजी की पड़" कहते हैं।
  • आशिया मोडजी द्वारा रचित "पाबू प्रकाश" इनके जीवन पर प्रमुख ग्रंथ है।
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रामदेवजी तंवर

रामसा पीर · रूणिचा रा धणी · पीरों के पीर · कृष्ण के अवतार

अति महत्वपूर्ण
जन्म स्थानउंडूकाश्मीर (शिव, बाड़मेर)
वंशतंवर
पिताअजमाल जी
मातामैणादे
पत्नीनेतलदे
गुरुबालीनाथ
घोड़ालीला (लीलो)
समाधिरामदेवरा (जैसलमेर), 1458 ई.
  • रामदेवजी ने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को रूणिचा (रामदेवरा) में रामसरोवर तालाब के किनारे जीवित समाधि ली।
  • मेला: रामदेवरा में भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक — यह सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा मेला है।
  • इन्होंने कामड़िया पंथ की स्थापना की। मेले में कामड़ जाति की महिलाएं तेरहताली नृत्य करती हैं (प्रसिद्ध नृत्यांगना — मांगीबाई, पादरला, पाली)।
  • रामदेवजी एकमात्र लोक देवता हैं जो कवि भी थे — इनकी रचना "चौबीस बाणियां" प्रसिद्ध है।
  • इन्होंने भैरव राक्षस का वध कर पोकरण क्षेत्र को आतंक से मुक्त कराया।
  • मक्का से आए पांच पीरों को इन्होंने परचा (चमत्कार) दिया, तब पीरों ने इन्हें "पीरों का पीर" कहा।
  • इन्होंने छुआछूत का विरोध किया; मेघवाल जाति की डाली बाई को अपनी धर्म बहन बनाया। डाली बाई की समाधि भी रामदेवरा में रामदेवजी की समाधि के पास है।
  • प्रतीक: पगल्ये (चरण चिह्न) · ध्वजा: पचरंगी "नेजा" · भक्त: "रिखिया" · रात्रि जागरण: "जम्मा"।
  • अन्य मंदिर: मसूरिया पहाड़ी (जोधपुर), बिराठिया (अजमेर), सुरताखेड़ा (चित्तौड़गढ़), छोटा रामदेवरा (जूनागढ़, गुजरात)।
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हड़बूजी सांखला

शकुन शास्त्र के ज्ञाता · वचन सिद्ध पुरुष

पंच पीर
जन्म स्थानभूंडेल (नागौर)
वंशसांखला
पितामेहाजी सांखला
गुरुबालीनाथ
मुख्य स्थलबेंगटी (फलोदी)
पूजागाड़ी (छकड़ा)
  • हड़बूजी, रामदेवजी के मौसेरे भाई थे और उन्हीं की प्रेरणा से अस्त्र-शस्त्र त्यागकर योगी बने।
  • इन्होंने राव जोधा को कटार भेंट कर मंडोर विजय का आशीर्वाद दिया था। जोधा ने बदले में इन्हें बेंगटी गांव भेंट किया।
  • बेंगटी के मंदिर में इनकी गाड़ी (छकड़े) की पूजा होती है, जिसमें ये पंगु गायों के लिए घास लाते थे।
  • मंदिर के पुजारी सांखला राजपूत होते हैं।
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मेहाजी मांगलिया

मांगलिया राजपूतों के इष्टदेव

पंच पीर
मुख्य मंदिरबापणी (जोधपुर)
घोड़ाकिरड़ काबरा
मेलाभाद्रपद कृष्ण अष्टमी
  • जैसलमेर के राणगदेव भाटी से गायों की रक्षा करते हुए वीरगति पाई।
  • मान्यता है कि इनके मंदिर के पुजारी का वंश आगे नहीं बढ़ता, इसलिए पुजारी गोद लेकर परंपरा चलाते हैं।
  • जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) को मांगलिया राजपूत इनकी विशेष पूजा करते हैं।
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वीर तेजाजी

काला-बाला के देवता · कृषि कार्यों के उपकारक · गौरक्षक

अति महत्वपूर्ण
जन्मखड़नाल (नागौर), माघ शुक्ल चतुर्दशी
जाति / गोत्रजाट (धौलिया)
पिताताहड़ जी
मातारामकंवरी
पत्नीपेमल (पनेर गांव)
घोड़ीलीलण (सिणगारी)
पुजारीघोड़ला
मेलाभाद्रपद शुक्ल दशमी
  • तेजाजी ने लाछा गूजरी की गायों को मेर (मीणा) लुटेरों से छुड़ाया। वचन निभाने हेतु लौटकर उन्होंने नाग से स्वयं को डसवाया।
  • सेंदरिया (ब्यावर) में नाग ने डसा तथा सुरसुरा (अजमेर) में देहांत हुआ।
  • परबतसर पशु मेला (डीडवाना-कुचामन) — भाद्रपद शुक्ल दशमी को लगने वाला यह मेला आय की दृष्टि से राज्य का सबसे बड़ा पशु मेला है (नागौरी बैलों के लिए प्रसिद्ध)।
  • सर्पदंश पीड़ित व्यक्ति के दाहिने पैर में "तेजाजी की तांती" बांधी जाती है।
  • किसान खेत में बुवाई से पहले "तेजा टेर" गाते हैं — तेजाजी कृषि के उपकारक देवता हैं।
  • प्रतीक: तलवारधारी अश्वारोही योद्धा, जिनकी जीभ पर सर्प डस रहा होता है।
  • अन्य प्रमुख स्थल: खड़नाल, सुरसुरा, भांवता (नागौर), ब्यावर (तेजा चौक)।
  • भारत सरकार ने 2011 में तेजाजी पर डाक टिकट जारी किया।
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देवनारायणजी

गुर्जरों के आराध्य · विष्णु के अवतार · आयुर्वेद के ज्ञाता

अति महत्वपूर्ण
जन्म स्थानगोठां दड़ावत, आसींद (भीलवाड़ा)
बचपन का नामउदयसिंह
पितासवाई भोज (बगड़ावत)
मातासेढू खटाणी
पत्नीपीपलदे (धार के जयसिंह परमार की पुत्री)
घोड़ालीलागर
भोपेगुर्जर जाति के
वाद्यजंतर
  • देवनारायणजी ने अपने पिता और बगड़ावत भाइयों की हत्या का प्रतिशोध लिया।
  • देवनारायण की फड़ राजस्थान की सबसे लंबी फड़ है और इसमें सर्वाधिक गीत हैं। इसे गुर्जर भोपे जंतर वाद्य के साथ बांचते हैं।
  • भारत सरकार ने 1992 में देवनारायण की फड़ पर डाक टिकट जारी किया।
  • इनके मंदिरों में मूर्ति के स्थान पर ईंटों की पूजा होती है और नीम की पत्तियां चढ़ाई जाती हैं।
  • प्रमुख मंदिर: सवाई भोज मंदिर (आसींद), देवधाम जोधपुरिया (टोंक), देवमाली (ब्यावर) — यहीं देह त्याग किया, देव डूंगरी (चित्तौड़गढ़)।
  • देवमाली गांव को 2024 में भारत सरकार द्वारा "सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांव" का पुरस्कार मिला।
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मल्लीनाथजी

मालाणी क्षेत्र के लोक देवता · भविष्यदृष्टा संत

पितारावल सलखा
माताजाणीदे
पत्नीरूपादे
गुरुउगमसी भाटी
मुख्य मंदिरतिलवाड़ा (बालोतरा)
मेलाचैत्र कृष्ण एकादशी – चैत्र शुक्ल एकादशी
  • बाड़मेर-बालोतरा के मालाणी क्षेत्र का नाम इन्हीं के नाम पर पड़ा।
  • 1378 ई. में मालवा के सूबेदार निजामुद्दीन की सेना को पराजित किया।
  • तिलवाड़ा पशु मेला लूणी नदी के किनारे लगता है — थारपारकर व कांकरेज नस्ल के पशुओं के लिए प्रसिद्ध।
  • इनकी पत्नी रूपादे का मंदिर मालाजाल गांव में है।

अन्य प्रमुख लोक देवता

🗡️ कल्लाजी राठौड़

जन्म सामियाना (मेड़ता, नागौर)। मीराबाई के भतीजे। चार हाथ वाले देवता व शेषनाग के अवतार। 1567-68 ई. के चित्तौड़ के तीसरे साके में जयमल को कंधे पर बिठाकर युद्ध किया। छतरी चित्तौड़ दुर्ग में भैरवपोल के पास; मुख्य पीठ रनेला। गुरु — भैरवनाथ।

🌳 तल्लीनाथजी

मूल नाम गांगदेव राठौड़, पिता वीरमदेव, गुरु जालंधरनाथ। शेरगढ़ (जोधपुर) के शासक रहे। पंचमुखी पहाड़ी (पांचोटा, जालोर) पर मंदिर। इनके ओरण से कोई पेड़-पौधा नहीं काटता — प्रकृति प्रेमी देवता।

🐄 बिग्गाजी

जन्म रीडी (बीकानेर)। जाखड़ जाटों के कुलदेवता। गायों को मुस्लिम लुटेरों से छुड़ाते हुए वीरगति पाई।

🛡️ वीर फत्ताजी

साथू गांव (जालोर) के लोक देवता। गांव की रक्षा के लिए लुटेरों से लड़ते हुए शहीद। मेला भाद्रपद शुक्ल नवमी।

🐍 केसरिया कुंवरजी

गोगाजी के पुत्र। थान पर सफेद ध्वजा फहराई जाती है। भोपा सर्पदंश पीड़ित का ज़हर मुंह से चूसकर निकालता है।

🐃 देव बाबा

मंदिर नगला जहाज (भरतपुर)। ग्वालों के पालनहार व पशु चिकित्सक; गुर्जर व मेव इन्हें पूजते हैं। सवारी — भैंसा। मेला भाद्रपद शुक्ल पंचमी व चैत्र शुक्ल पंचमी।

🌧️ मामादेव

बरसात के देवता। इनकी कोई मूर्ति नहीं होती; गांव के बाहर लकड़ी का कलात्मक तोरण बनाकर पूजा की जाती है। प्रसन्न करने हेतु भैंसे की बलि दी जाती थी।

🏞️ भोमियाजी

भूमि रक्षक देवता। लगभग हर गांव में इनका थान होता है।

🐍 हरिराम बाबा

मंदिर झोरड़ा (नागौर)। मंदिर में मूर्ति के स्थान पर सांप की बांबी की पूजा होती है।

🙏 भूरिया बाबा

मीणा जनजाति के इष्टदेव। मंदिर पोसालिया (सिरोही) में जवाई नदी के किनारे। मान्यता है कि मीणा इनकी झूठी कसम नहीं खाते।

💰 डूंगजी-जवारजी

शेखावाटी (सीकर) के देवता। धनी लोगों से धन लूटकर गरीबों में बांटते थे। 1847 ई. में अंग्रेजों की नसीराबाद छावनी लूटी।

🎭 इलोजी

होलिका के होने वाले पति माने जाते हैं। मारवाड़ में होली पर पूजा; अविवाहित इनसे जीवनसाथी की कामना करते हैं। छेड़छाड़ के देवता भी कहलाते हैं।

तुलनात्मक तालिका

लोक देवताजन्म / मुख्य स्थलघोड़ा / सवारीविशेष पहचान
गोगाजीददरेवा (चूरू) / गोगामेड़ीनीली घोड़ीसर्पों के देवता
पाबूजीकोलू (फलोदी)केसर कालमीऊंटों के देवता, सबसे लोकप्रिय फड़
रामदेवजीउंडूकाश्मीर / रामदेवरालीलाकामड़िया पंथ, तेरहताली नृत्य
हड़बूजीभूंडेल / बेंगटी—गाड़ी की पूजा, शकुन शास्त्री
मेहाजीबापणी (जोधपुर)किरड़ काबरामांगलियों के इष्टदेव
तेजाजीखड़नाल / परबतसरलीलणकाला-बाला के देवता
देवनारायणजीआसींद (भीलवाड़ा)लीलागरसबसे लंबी फड़, ईंटों की पूजा
मल्लीनाथजीतिलवाड़ा (बालोतरा)—मालाणी क्षेत्र, तिलवाड़ा पशु मेला
देव बाबानगला जहाज (भरतपुर)भैंसाग्वालों के पालनहार
फड़वाद्य यंत्रबांचने वाले भोपे
पाबूजी की फड़रावणहत्थानायक / आयड़ी
देवनारायण की फड़जंतरगुर्जर
रामदेवजी की फड़रावणहत्थाकामड़

⚠️ परीक्षा में भ्रम वाले तथ्य: (1) पंचपीर — पाबूजी, हड़बूजी, रामदेवजी, गोगाजी, मांगलिया मेहाजी। (2) गोगाजी — “सांपों के देवता”, “जाहरपीर”; गोगामेड़ी (हनुमानगढ़)। (3) तेजाजी — “काला-बाला” के देवता, खरनाल (नागौर); रामदेवजी — “रूणीचा के धणी”।

वन-लाइनर तथ्य (Quick Revision)

  1. "जाहर पीर" की उपाधि गोगाजी को महमूद गजनवी ने दी।
  2. मारवाड़ में ऊंट लाने का श्रेय पाबूजी को है।
  3. लोक देवताओं में एकमात्र कवि — रामदेवजी (चौबीस बाणियां)।
  4. रामदेवजी ने कामड़िया पंथ चलाया।
  5. तेरहताली नृत्य रामदेवजी के मेले में कामड़ महिलाएं करती हैं।
  6. आय की दृष्टि से सबसे बड़ा पशु मेला — परबतसर (तेजाजी)।
  7. मूर्ति के स्थान पर ईंटों की पूजा — देवनारायणजी।
  8. सबसे लंबी फड़ — देवनारायणजी; सबसे लोकप्रिय फड़ — पाबूजी।
  9. चार हाथ वाले लोक देवता — कल्लाजी राठौड़।
  10. मूर्ति रहित, लकड़ी के तोरण से पूजे जाने वाले — मामादेव।
  11. बेंगटी में गाड़ी की पूजा — हड़बूजी।
  12. "गांव-गांव खेजड़ी, गांव-गांव गोगो" — गोगाजी।
  13. गोगामेड़ी पर "बिस्मिल्लाह" अंकित, मकबरा शैली — निर्माण फिरोजशाह तुगलक।
  14. पुजारी "घोड़ला" कहलाते हैं — तेजाजी के।

अभ्यास प्रश्न (MCQ)

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1 "जाहर पीर" के नाम से किस लोक देवता को जाना जाता है?

2 पाबूजी की फड़ किस वाद्य यंत्र के साथ बांची जाती है?

3 परबतसर का प्रसिद्ध पशु मेला किस लोक देवता से संबंधित है?

4 किस लोक देवता के मंदिर में मूर्ति के स्थान पर ईंटों की पूजा होती है?

5 "चौबीस बाणियां" किस लोक देवता की रचना है?

6 तेजाजी की घोड़ी का नाम क्या था?

7 "चार हाथ वाले लोक देवता" किसे कहा जाता है?

8 बेंगटी (फलोदी) में किस लोक देवता की गाड़ी की पूजा होती है?

9 तिलवाड़ा पशु मेला किस नदी के किनारे लगता है?

10 मामादेव को किस रूप में जाना जाता है?

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