राजस्थान के प्रमुख युद्ध
राजस्थान का इतिहास युद्धों और बलिदानों का इतिहास है। तराइन से लेकर हल्दीघाटी और दिवेर तक, यहां के शासकों ने तुर्कों, मुगलों और पड़ोसी राज्यों के विरुद्ध अनेक निर्णायक युद्ध लड़े। परीक्षा में युद्ध का वर्ष, स्थान, पक्ष और परिणाम सबसे अधिक पूछे जाते हैं।
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तुर्क आक्रमण काल के युद्ध
तराइन के युद्ध
पृथ्वीराज चौहान तृतीय बनाम मुहम्मद गौरी
- प्रथम युद्ध में दिल्ली के गवर्नर गोविंदराज (गोविंदराय तोमर) ने गौरी को घायल किया।
- द्वितीय युद्ध की पराजय से भारत में तुर्क शासन की नींव पड़ी; पृथ्वीराज बंदी बनाए गए।
| युद्ध / आक्रमण | वर्ष | पक्ष | परिणाम |
|---|---|---|---|
| रणथंभौर | 1301 | हम्मीर देव चौहान vs अलाउद्दीन खिलजी | राजस्थान का प्रथम साका; रंगदेवी का जौहर |
| चित्तौड़ | 1303 | रावल रतनसिंह vs अलाउद्दीन खिलजी | पद्मिनी का जौहर; खिज्राबाद नाम |
| सिवाणा | 1308 | सातलदेव vs अलाउद्दीन खिलजी | साका; नाम खैराबाद |
| जालोर | 1311-12 | कान्हड़देव vs अलाउद्दीन खिलजी | साका; नाम जलालाबाद |
| सिंगोली | 14वीं सदी | महाराणा हम्मीर vs मुहम्मद बिन तुगलक | हम्मीर विजयी |
| गागरोन | 1423 | अचलदास खींची vs होशंगशाह (मालवा) | प्रथम साका |
| सारंगपुर | 1437 | महाराणा कुंभा vs महमूद खिलजी (मालवा) | कुंभा विजयी; विजय स्तंभ बना |
राणा सांगा के युद्ध
खानवा का युद्ध
17 मार्च 1527 · राणा सांगा बनाम बाबर
- बाबर ने तोपखाने और "तुलुगमा" युद्ध पद्धति का प्रयोग किया; युद्ध को "जिहाद" घोषित किया, शराब न पीने की शपथ ली और विजय के बाद "गाज़ी" की उपाधि धारण की।
- सांगा के पक्ष में कई राजपूत शासक व महमूद लोदी, हसन खां मेवाती थे — सांगा ने "पाती परवन" परंपरा से राजाओं को आमंत्रित किया।
- घायल सांगा को युद्धभूमि से बाहर ले जाया गया; झाला अज्जा ने राजचिह्न धारण कर युद्ध जारी रखा।
- इस युद्ध के बाद भारत में मुगल साम्राज्य की नींव मज़बूत हुई।
| युद्ध | वर्ष | पक्ष | विजेता |
|---|---|---|---|
| खातोली (बूंदी/कोटा क्षेत्र) | 1517 | सांगा vs इब्राहिम लोदी | सांगा |
| बाड़ी (धौलपुर) | 1518 | सांगा vs इब्राहिम लोदी | सांगा |
| गागरोन | 1519 | सांगा vs महमूद खिलजी द्वितीय | सांगा |
| बयाना (भरतपुर) | 1527 | सांगा vs बाबर की सेना | सांगा |
| खानवा (भरतपुर) | 1527 | सांगा vs बाबर | बाबर |
मारवाड़ के युद्ध
गिरि-सुमेल का युद्ध
जनवरी 1544 · राव मालदेव बनाम शेरशाह सूरी
- स्थान — गिरि व सुमेल गांव, जैतारण के पास।
- शेरशाह ने जाली पत्रों से मालदेव के मन में अपने सरदारों के प्रति संदेह पैदा कर दिया; मालदेव युद्ध से पहले लौट गए।
- सेनापति जैता व कूंपा ने थोड़ी सेना के साथ वीरता से लड़कर प्राण दिए।
- कठिन विजय के बाद शेरशाह ने कहा — "मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता।"
⚔️ पाहेबा (साहेबा) युद्ध — 1541
जोधपुर के मालदेव ने बीकानेर के राव जैतसी को हराया; जैतसी मारे गए।
🏹 धरमत युद्ध — 1658
उज्जैन (मध्य प्रदेश) के पास; मुगल उत्तराधिकार संघर्ष में दारा की ओर से जसवंतसिंह प्रथम ने औरंगजेब-मुराद की सेना से युद्ध किया; औरंगजेब विजयी।
🛡️ दत्ताणी युद्ध — 1583
सिरोही के राव सुरताण ने अकबर की सेना को हराया।
हल्दीघाटी एवं दिवेर
हल्दीघाटी का युद्ध
18 जून 1576 · महाराणा प्रताप बनाम मुगल सेना (मानसिंह)
- अन्य नाम: खमनोर का युद्ध (अबुल फज़ल), गोगुंदा का युद्ध (बदायूंनी), "मेवाड़ की थर्मोपल्ली" (कर्नल टॉड)।
- प्रताप का घोड़ा चेतक घायल होकर भी प्रताप को सुरक्षित निकाल ले गया; बलीचा गांव में चेतक की छतरी है।
- झाला मान (बीदा) ने राजचिह्न धारण कर प्रताप की जगह युद्ध किया और बलिदान दिया।
- युद्ध के बाद रक्त से भरा मैदान "रक्त तलाई" कहलाया। प्रताप का हाथी रामप्रसाद मुगलों ने पकड़ा और उसका नाम "पीरप्रसाद" रखा।
- प्रताप की सेना में भील सरदार राणा पूंजा व हकीम खां सूर; युद्ध के बाद भामाशाह ने आर्थिक सहायता दी।
दिवेर का युद्ध
अक्टूबर 1582 · मेवाड़ का मैराथन
- स्थान — दिवेर (राजसमंद); महाराणा प्रताप ने मुगल चौकियों पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की।
- कुंवर अमरसिंह ने मुगल सेनापति सुल्तान खां को भाले से मारा।
- कर्नल टॉड ने इसे "मेवाड़ का मैराथन" कहा; इसके बाद प्रताप ने चित्तौड़ व मांडलगढ़ को छोड़कर अधिकांश मेवाड़ वापस जीत लिया और चावंड को राजधानी बनाया।
18वीं सदी के युद्ध
| युद्ध | वर्ष | पक्ष | परिणाम |
|---|---|---|---|
| गंगवाना | 1741 | सवाई जयसिंह vs अभयसिंह व बख्तसिंह (जोधपुर) | जयसिंह विजयी |
| राजमहल (टोंक) | 1747 | ईश्वरीसिंह vs माधोसिंह व सहयोगी | ईश्वरीसिंह विजयी; ईसरलाट बनवाई |
| बगरू (जयपुर) | 1748 | ईश्वरीसिंह vs माधोसिंह व मराठा | ईश्वरीसिंह पराजित |
| तूंगा (जयपुर) | 1787 | जयपुर-जोधपुर vs महादजी सिंधिया | राजपूत विजयी |
| पाटन (सीकर) | 1790 | जयपुर-जोधपुर vs सिंधिया | सिंधिया विजयी |
| मेड़ता | 1790 | जोधपुर vs सिंधिया | सिंधिया विजयी |
⚠️ परीक्षा में भ्रम वाले तथ्य: (1) तराइन प्रथम 1191 (पृथ्वीराज जीते), द्वितीय 1192 (हारे)। (2) खानवा — 17 मार्च 1527, रूपवास (भरतपुर)। (3) हल्दीघाटी — 18 जून 1576; टॉड ने कहा “मेवाड़ की थर्मोपल्ली”।
वन-लाइनर तथ्य (Quick Revision)
- तराइन प्रथम — 1191 (पृथ्वीराज विजयी); द्वितीय — 1192 (गौरी विजयी)।
- सारंगपुर — 1437, कुंभा vs महमूद खिलजी।
- बयाना — 16 फरवरी 1527 (सांगा विजयी); खानवा — 17 मार्च 1527 (बाबर विजयी)।
- बाबर की युद्ध पद्धति — तुलुगमा; उपाधि — गाज़ी।
- "मुट्ठी भर बाजरे" — शेरशाह, गिरि-सुमेल (1544); जैता-कूंपा।
- हल्दीघाटी — 18 जून 1576; "मेवाड़ की थर्मोपल्ली" (टॉड)।
- हल्दीघाटी के प्रत्यक्षदर्शी — बदायूंनी; हरावल — हकीम खां सूर।
- दिवेर (1582) — "मेवाड़ का मैराथन"; सुल्तान खां को अमरसिंह ने मारा।
- धरमत (1658) — जसवंतसिंह vs औरंगजेब।
- राजमहल (1747) विजय स्मारक — ईसरलाट (सरगासूली)।
अभ्यास प्रश्न (MCQ)
विकल्प चुनें — सही उत्तर तुरंत दिखेगा।
1 तराइन का प्रथम युद्ध कब हुआ?
2 खानवा का युद्ध किनके बीच हुआ?
3 "मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता" — यह किसने कहा?
4 हल्दीघाटी युद्ध की तिथि क्या है?
5 "मेवाड़ की थर्मोपल्ली" किस युद्ध को कहा गया?
6 "मेवाड़ का मैराथन" किस युद्ध को कहा गया?
7 हल्दीघाटी युद्ध में प्रताप की सेना के हरावल का नेतृत्व किसने किया?
8 सारंगपुर युद्ध में कुंभा ने किसे हराया?
9 खानवा का युद्धस्थल वर्तमान में किस जिले में है?
10 राजमहल युद्ध (1747) में विजय के बाद ईश्वरीसिंह ने क्या बनवाया?