राजस्थान के सिक्के (मुद्राएं)

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सिक्के (मुद्राएं) इतिहास जानने के सबसे विश्वसनीय पुरातात्विक स्रोतों में से हैं। सिक्कों पर अंकित शासक का नाम, उपाधि, तिथि, देवी-देवता, पशु-पक्षी व प्रतीक से तत्कालीन राजनीतिक स्थिति, धार्मिक विश्वास, व्यापार व आर्थिक समृद्धि का पता चलता है। राजस्थान में ईसा पूर्व की आहत (पंचमार्क) मुद्राओं से लेकर रियासतों के अपने-अपने सिक्कों तक की लगभग 2,500 वर्षों की लंबी परंपरा मिलती है। सिक्कों के अध्ययन को "मुद्राशास्त्र" (न्यूमिस्मेटिक्स) कहते हैं।

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3075
आहत सिक्के — रैढ़ (टोंक)
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बयाना (1946)
गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राएं
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सरवानिया
पश्चिमी क्षत्रपों के सिक्के (बांसवाड़ा)
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W.W. वेब (1893)
रियासतों के सिक्कों पर पुस्तक
📑 विषय सूची 14 टॉपिक

इतिहास में सिक्कों का महत्व

📏 मुद्रा की धातुएं

सोना (स्वर्ण / मोहर / दीनार), चांदी (रूपक / रुपया / द्रम्म), तांबा (पैसा / टका) और मिश्रित धातु।

🏭 टकसाल

सिक्के ढालने के स्थान को टकसाल कहते हैं; सिक्कों पर प्रायः टकसाल का नाम भी अंकित होता था।

🔤 सिक्कों पर लिपि

प्राचीन — ब्राह्मी व खरोष्ठी; मध्यकाल — नागरी व फारसी; रियासतकाल — फारसी व देवनागरी।

प्राचीनतम सिक्के — आहत (पंचमार्क) मुद्राएं

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आहत (पंचमार्क) सिक्के

भारत के प्राचीनतम सिक्के · लगभग 6ठी शताब्दी ई.पू. से

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  • धातु के टुकड़ों पर ठप्पे (पंच) मारकर चिह्न अंकित किए जाते थे, इसलिए ये "आहत" (ठोककर बनाए गए) कहलाए।
  • अधिकांश चांदी के, कुछ तांबे के; आकार प्रायः चौकोर या आयताकार, कोई निश्चित गोल रूप नहीं।
  • इन पर सूर्य, वृक्ष, पर्वत, हाथी, बैल, मछली, षडारचक्र जैसे चिह्न मिलते हैं, पर किसी शासक का नाम या लेख नहीं।
  • प्राचीन ग्रंथों में इन्हें "कार्षापण", "पण" या "धरण" कहा गया।
प्राप्ति स्थलवर्तमान जिलाविशेष
रैढ़टोंकएक साथ 3075 आहत चांदी के सिक्के — "प्राचीन भारत का टाटानगर" कहे जाने वाले रैढ़ में लोहे के भंडार भी मिले PYQ
गुरारासीकरलगभग 2744 आहत सिक्कों का भंडार
बैराठ (विराटनगर)कोटपूतली-बहरोड़एक कपड़े की पोटली में आहत व इंडो-ग्रीक शासकों के चांदी के सिक्के
नलियासर-सांभरजयपुरआहत, इंडो-ग्रीक व कुषाणकालीन सिक्के
नगरटोंकआहत सिक्कों के साथ हज़ारों मालव सिक्के

गणराज्यों के सिक्के

मौर्यों के बाद राजस्थान में कई गणराज्य (जनपद) शक्तिशाली हुए, जिन्होंने अपने नाम के सिक्के चलाए। ये सिक्के मुख्यतः तांबे के हैं और इन पर ब्राह्मी लिपि में गण का नाम अंकित है।

गणराज्यक्षेत्रसिक्कों का विवरण
मालवनगर (टोंक), जयपुर-टोंक क्षेत्रहज़ारों तांबे के छोटे सिक्के; लेख — "मालवानां जय"; ए.सी.एल. कार्लाइल ने नगर से लगभग 6000 सिक्के प्राप्त किए
यौधेयउत्तरी राजस्थान — हनुमानगढ़, श्रीगंगानगरयोद्धा जाति; सिक्कों पर कार्तिकेय व "यौधेय गणस्य जय"
शिविमाध्यमिका / नगरी (चित्तौड़गढ़)लेख — "मज्झिमिकाय सिबि जनपदस" (माध्यमिका के शिवि जनपद का)
अर्जुनायनभरतपुर-अलवर क्षेत्रलेख — "अर्जुनायनानां जय"
राजन्यउत्तर-पूर्वी राजस्थानतांबे के सिक्के

विदेशी शासकों के सिक्के

🏛️ इंडो-ग्रीक (हिंद-यवन)

बैराठ व सांभर से प्राप्त; चांदी के सिक्कों पर यूनानी शासकों (जैसे मिनेंडर) की आकृति व यूनानी-खरोष्ठी लेख। भारत में सर्वप्रथम लेखयुक्त व शासक की आकृति वाले सिक्के इन्हीं ने चलाए।

⚔️ कुषाण

रंगमहल (हनुमानगढ़) व सांभर से प्राप्त; कुषाण शासक कनिष्क-हुविष्क के तांबे-सोने के सिक्के; उत्तरी राजस्थान पर कुषाण प्रभाव का प्रमाण।

💰 पश्चिमी क्षत्रप (शक)

सरवानिया (बांसवाड़ा) से 1911 में पश्चिमी क्षत्रप शासकों के लगभग 2393 चांदी के सिक्के मिले — दक्षिणी राजस्थान पर शक शासन का प्रमाण। PYQ

गुप्तकालीन सिक्के — बयाना निधि

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बयाना (भरतपुर) स्वर्ण मुद्रा भंडार

1946 · भारत में गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं का सबसे बड़ा भंडार

अति महत्वपूर्ण
  • 1946 में बयाना के निकट (हुल्लनपुरा गांव) से गुप्त शासकों की लगभग 1800 से अधिक स्वर्ण मुद्राएं मिलीं।
  • इनमें सर्वाधिक सिक्के चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) के हैं; समुद्रगुप्त, कुमारगुप्त आदि के सिक्के भी शामिल।
  • गुप्त सिक्कों पर राजा को धनुर्धर, अश्वारोही, सिंह-निहंता रूप में तथा दूसरी ओर लक्ष्मी अंकित है।
  • गुप्तकाल की स्वर्ण मुद्राओं को "दीनार" कहा जाता था।

पूर्व-मध्यकाल व राजपूत काल के सिक्के

सिक्के / वंशविवरण
गधैया सिक्केहूण-गुर्जर काल के भद्दे, मोटे चांदी-तांबे के सिक्के; ससानी (ईरानी) सिक्कों की नकल; राजा के मुख की बिगड़ी आकृति गधे के खुर जैसी लगने के कारण "गधैया"; पूरे राजस्थान व गुजरात में व्यापक रूप से प्रचलित PYQ
गुर्जर-प्रतिहारसिक्के "द्रम्म" (चांदी) व "विशोपक" (छोटी इकाई) कहलाते थे; मिहिरभोज के सिक्कों पर "आदिवराह" व वराह की आकृति
चौहान (अजमेर)अजयराज ने चांदी-तांबे के सिक्के चलाए; उनकी रानी सोमलदेवी के नाम के सिक्के भी मिले — रानी के नाम से सिक्के जारी होने का दुर्लभ उदाहरण
पृथ्वीराज चौहान तृतीयसिक्कों पर एक ओर घुड़सवार व "पृथ्वीराज देव" लेख; तराइन के बाद मुहम्मद गौरी ने अपने सिक्कों पर लक्ष्मी की आकृति व नागरी लेख रखा
मेवाड़ (गुहिल)प्रारंभिक गुहिल शासकों के चांदी के सिक्के; महाराणा कुंभा ने तांबे के सिक्के (टंका) चलाए

सल्तनत व मुगल काल

रियासतों के सिक्के

रियासतसिक्के का नामविशेष
जयपुरझाड़शाहीसिक्के पर झाड़ (छह शाखाओं वाला पौधा) का चिह्न; जयपुर में मुहम्मदशाही सिक्के भी चले PYQ
जोधपुरविजयशाहीमहाराजा विजयसिंह (1781) के समय; तांबे का सिक्का — "ढब्बूशाही"; सोने की मोहर भी
बीकानेरगजशाहीमहाराजा गजसिंह के नाम पर
जैसलमेरअखैशाहीमहारावल अखैसिंह (1756); तांबे का सिक्का — "डोडिया"
मेवाड़ (उदयपुर)स्वरूपशाहीमहाराणा स्वरूपसिंह के समय (सोने-चांदी के); अन्य — चांदोड़ी, भिलाड़ी (भीलवाड़ा टकसाल), तांबे के ढींगला, त्रिशूलिया
अलवररावशाही"राव राजा" उपाधि के आधार पर
झालावाड़मदनशाहीराजराणा मदनसिंह के नाम पर
कोटागुमानशाहीमहाराव गुमानसिंह के नाम पर
करौलीमाणकशाहीमहाराजा माणकपाल के नाम पर
धौलपुरतमंचाशाहीसिक्के पर तमंचे (पिस्तौल) का चिह्न
बांसवाड़ालछमनशाहीमहारावल लक्ष्मणसिंह के नाम पर
प्रतापगढ़सालिमशाहीमहारावत सालिमसिंह के नाम पर
किशनगढ़शाहआलमीमुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के नाम पर
सिरोहीभिलाड़ी (मेवाड़ी)अपनी टकसाल न होने से मेवाड़ के भिलाड़ी सिक्के प्रचलित

🧠 याद करने की ट्रिक: अधिकांश रियासती सिक्के उस शासक के नाम पर हैं जिसने उन्हें चलाया — विजयसिंह → विजयशाही, गजसिंह → गजशाही, अखैसिंह → अखैशाही, स्वरूपसिंह → स्वरूपशाही, मदनसिंह → मदनशाही। अपवाद — झाड़शाही (चिह्न पर) व तमंचाशाही (चिह्न पर)।

ब्रिटिश काल व रियासती सिक्कों का अंत

मुद्रा संबंधी प्रमुख शब्द

कार्षापण / पण

प्राचीन आहत चांदी-तांबे के सिक्के।

दीनार

गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्रा (रोमन "डिनेरियस" से)।

द्रम्म

प्रतिहारकालीन चांदी का सिक्का (यूनानी "द्रख्म" से)।

टंका / जीतल

सल्तनतकालीन चांदी / तांबे के सिक्के।

रुपया / दाम

शेरशाह का चांदी का रुपया / तांबे का दाम।

मोहर

रियासतों व मुगलों की सोने की मुद्रा।

⚠️ परीक्षा में भ्रम वाले तथ्य: (1) रैढ़ (टोंक) — 3075 आहत सिक्के; बयाना (भरतपुर) — गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्के; सरवानिया (बांसवाड़ा) — पश्चिमी क्षत्रप। (2) विजयशाही जोधपुर का, झाड़शाही जयपुर का। (3) अखैशाही जैसलमेर का है, बीकानेर का नहीं (बीकानेर — गजशाही)। (4) "मालवानां जय" — मालव (नगर, टोंक); "मज्झिमिकाय सिबि जनपदस" — शिवि (नगरी, चित्तौड़)।

वन-लाइनर तथ्य (Quick Revision)

  1. भारत के प्राचीनतम सिक्के — आहत (पंचमार्क); प्राचीन नाम — कार्षापण।
  2. रैढ़ (टोंक) से — 3075 आहत सिक्के; गुरारा (सीकर) से — लगभग 2744।
  3. मालव गणराज्य के सिक्के — नगर (टोंक); लेख — "मालवानां जय"।
  4. शिवि जनपद के सिक्के — नगरी / माध्यमिका (चित्तौड़गढ़)।
  5. यौधेयों के सिक्कों पर — कार्तिकेय; क्षेत्र — उत्तरी राजस्थान।
  6. इंडो-ग्रीक सिक्के — बैराठ, सांभर; कुषाण सिक्के — रंगमहल (हनुमानगढ़)।
  7. पश्चिमी क्षत्रपों के 2393 सिक्के — सरवानिया (बांसवाड़ा), 1911।
  8. गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्रा भंडार — बयाना (भरतपुर), 1946; सर्वाधिक सिक्के — चंद्रगुप्त द्वितीय।
  9. ससानी सिक्कों की नकल वाले भद्दे सिक्के — गधैया।
  10. प्रतिहारकालीन सिक्के — द्रम्म व विशोपक; मिहिरभोज — "आदिवराह"।
  11. रानी के नाम से सिक्के — सोमलदेवी (अजयराज चौहान की रानी)।
  12. जयपुर — झाड़शाही; जोधपुर — विजयशाही (तांबा — ढब्बूशाही)।
  13. बीकानेर — गजशाही; जैसलमेर — अखैशाही (तांबा — डोडिया)।
  14. मेवाड़ — स्वरूपशाही, चांदोड़ी, भिलाड़ी; धौलपुर — तमंचाशाही; करौली — माणकशाही।
  15. रियासती सिक्कों पर पुस्तक — W.W. वेब (1893); अंग्रेज़ी रुपया — कलदार।

अभ्यास प्रश्न (MCQ)

विकल्प चुनें — सही उत्तर तुरंत दिखेगा।

1 भारत के प्राचीनतम सिक्के कौन-से हैं?

2 रैढ़ (टोंक) से कितने आहत सिक्के प्राप्त हुए?

3 "मालवानां जय" लेख वाले सिक्के कहां से मिले?

4 "मज्झिमिकाय सिबि जनपदस" लेख किस जनपद के सिक्कों पर है?

5 पश्चिमी क्षत्रपों के 2393 चांदी के सिक्के कहां से मिले?

6 गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं का भंडार बयाना से कब मिला?

7 बयाना निधि में सर्वाधिक सिक्के किस शासक के हैं?

8 ससानी सिक्कों की नकल पर बने भद्दे सिक्के क्या कहलाते हैं?

9 "आदिवराह" अंकित सिक्के किस शासक के हैं?

10 किस चौहान रानी के नाम से सिक्के जारी हुए?

11 जयपुर रियासत का सिक्का क्या कहलाता था?

12 "अखैशाही" सिक्के किस रियासत के थे?

13 जोधपुर रियासत का तांबे का सिक्का क्या कहलाता था?

14 "तमंचाशाही" सिक्के किस रियासत के थे?

15 "द करेंसीज़ ऑफ द हिंदू स्टेट्स ऑफ राजपूताना" पुस्तक के लेखक कौन हैं?

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